डर लगता है…

डर लगता है तुम्हें बताने में वो जो हमारे बीच तासीर-इ-इज़हार था,
न जाने तुम्हें उसका एहसास हो या न हो।

डर लगता है तुम्हें समझाने में वो जो हसीं लम्हे से थे कुछ गिले-शिकवे,
न जाने तुम्हें सुनने की चाहत हो या न हो।

डर लगता है उस तस्वीर के स्याही में तुम्हारा इश्क़ पढ़ने में,
न जाने फिर वो मुराद हो या न हो।

डर लगता है तुम्हारी उन बातों पे, उन वादो पे रुठने में,
न जाने फिर तुम्हें मनाने की ख़्वाहिश हो या न हो।

डर लगता है आसमान तले तारों को देखके तुम्हें याद करने में,
न जाने फिर तुम्हें मेरा इंतेज़ार हो या न हो।

डर लगता है तुम्हारी उस टूटी हुई वादो के माला को पिरोने में,
न जाने तुम्हे फिर निभाना याद हो या न हो।

डर लगता है उस राह से जो मुझमे तुमसे थी, उस चाह से जो तुममे मुझसे थी,
न जाने फिर उन राहों में प्यार की बरसात हो या न हो।

डर लगता है कहने में वो जो दुआ की थी खुदा से,
न जाने फिर वो क़बूल हो या न हो।

डर लगता है सपनों में ख़ुदको तुम्हारी बाहों में पाने में,
न जाने फिर यह हकीक़त हो या न हो।

डर लगता है फिर इतनी मोहब्बत करने में,
न जाने उसकी मंज़िल हो या न हो।

डर लगता है तुम्हें अलविदा कहने में,
न जाने फिर मुलाक़ात हो या न हो।

डर लगता है तुम्हें अपनी रूह से जुदा करने में,
न जाने फिर मेरा वजूद हो या न हो।

– कृतिका वशिस्ट

Darr Lagta Ha…

Darr lagta hai tumhe batane me, woh jo humare beech taaseer-e-izhaar tha,
na jaane tumhe uska ehsaas ho ya na ho.

Darr lagta hai tumhe samjhane me woh haseen lamhe sey the kuch gilay-sikhway,
na jaane tumhe sunne ke chahat ho ya na ho.

Darr lagta hai us tasvir ke syahi me tumhara ishq padhne me,
na jaane fir wohi murad ho ya na ho.

Darr lagta hai tumhari unn baaton, unn waado pe ruthna me,
na jaane fir tumhe manaane ke khwaish ho ya na ho.

Darr lagta hai aasmaan talay taaro ko dekhke tum he yaad karne me,
na jaane fir tumhe mera intezaar ho ya na ho.

Darr lagta hai tumhare toote hue waado ke maala ko peeroney me,
na jaane tum he nibhana yaad ho ya na ho.

Darr lagta hai us rah se jo mujhme tumse the, us caah se jo tumme mujhse the,
na jaane us raho me fir pyaar ke barsaat ho ya na ho.

Darr lagta hai kehne me who jo dua ke the khuda se,
na jaane who qabool ho ya na ho.

Darr lagta hai sapno me khudko tumhari baahon me paane me,
na jaane fir yeh hakikat ho ya na ho.

Darr lagta hai fir itne mohabaat karne me,
na jaane uski koi manzil ho ya na ho.

Darr lagta hai ek akhari alwida tumse kehne me,
na jaane fir mulakaat ho ya na ho.

Darr lagta hai tumhe apne ruh se judaa karne me,
na jaane fir mera wajud ho ya na ho.

-Kritika Vashist